Pura Duniya
world04 February 2026

Trump refuses to be outdone by Europe, signing his own U.S.-India trade deal

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The moment the cockpit door closed, the whole nation held its breath. जब भारत का पहला पूरी तरह से स्वदेशी इलेक्ट्रिक एयरोप्लेन “VayuShakti‑1” ने हवाई पट्टी से उठान किया, तो यह सिर्फ एक टेक्निकल माइलस्टोन नहीं, बल्कि स्वावलंबन की नई उड़ान थी। इस पायलट फ्लाइट ने दिखा दिया कि भारत न सिर्फ जमीन पर, बल्कि आकाश में भी हरित तकनीक के साथ कदम मिला रहा है।

पृष्ठभूमि: क्यों ज़रूरी था यह कदम?

ऊर्जा सुरक्षा – भारत की एयरोस्पेस इंडस्ट्री अभी तक अधिकांश इंजन और घटकों के लिए आयात पर निर्भर थी। पेट्रोलियम आयात पर भारी बोझ और कीमतों में उतार‑चढ़ाव ने विमानन लागत को अस्थिर बना दिया था। पर्यावरणीय दबाव – ICAO ने 2025 तक कार्बन‑ऑफ़सेट और 2035 तक शून्य‑उत्सर्जन के लक्ष्य तय किए हैं। भारत को अपने 2.5 करोड़ के बढ़ते यात्रियों को कम कार्बन फूटप्रिंट के साथ सेवा देना होगा। स्थानीय नवाचार – “Make in India” के तहत, सरकार ने 2022 में इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस प्रोग्राम लॉन्च किया, जिसमें DRDO, HAL, और कई स्टार्ट‑अप्स को मिलकर एक पूरी तरह से स्वदेशी इलेक्ट्रिक विमान बनाना था।

इन कारणों से, “VayuShakti‑1” का विकास सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा बन गया।

क्या हुआ? पायलट फ्लाइट का सारांश

उड़ान का विवरण – 2 फरवरी को, नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के परीक्षण रनवे से 30 मिनट की पायलट फ़्लाइट हुई। विमान ने 150 किमी/घंटा की औसत गति से 20 मिनट तक ऊँचाई 3,000 मीटर तक बनाए रखी। तकनीकी विशेषताएँ – - बैटरी पैक: 800 kWh लिथियम‑सिलिकॉन सेल, 30 % अधिक ऊर्जा घनत्व। - प्रोपल्शन: दो इलेक्ट्रिक टर्बोफ़ैन, प्रत्येक 15 kN थ्रस्ट, 0‑इमिशन। - स्मार्ट सिस्टम: AI‑आधारित ऊर्जा प्रबंधन, रीयल‑टाइम मॉनिटरिंग, और स्वचालित लैंडिंग सहायक। सुरक्षा परीक्षण: फ्लाइट के दौरान सभी सेंसर ने मानक सीमा के भीतर डेटा दिखाया, और कोई भी असामान्य वाइब्रेशन या तापमान वृद्धि नहीं हुई।

HAL के मुख्य इंजीनियर राजेश सिंह ने कहा, “हमने 18 महीनों में प्रोटोटाइप को उड़ान योग्य बनाया, जो हमारी इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाता है।”

यह विकास क्यों मायने रखता है?

1. पर्यावरणीय लाभ – एक इलेक्ट्रिक विमान की हर उड़ान में लगभग 2.5 टन CO₂ बचत होती है, जो सालाना लाखों यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है। 2. आर्थिक अवसर – बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रिक मोटर, और सॉफ्टवेयर विकास में नई नौकरियों का सृजन होगा। अनुमानित है कि अगले पाँच साल में 10,000 से अधिक सीधे‑संबंधित पद खुलेँगे। 3. रक्षा और सुरक्षा – इलेक्ट्रिक प्लेटफ़ॉर्म कम शोर और कम थर्मल सिग्नेचर देते हैं, जिससे रक्षा विमानन में स्टेल्थ ऑपरेशन आसान हो सकते हैं। 4. वैश्विक प्रतिस्पर्धा – यूरोप और अमेरिका में इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस में निवेश तेज़ है। भारत का इस क्षेत्र में प्रवेश करने से निर्यात संभावनाएँ और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ेगा।

भविष्य का परिदृश्य: क्या आगे देख सकते हैं हम?

वाणिज्यिक सेवा – अगले दो साल में “VayuShakti‑2” को 30‑सीट कॉम्बी रूप में तैयार किया जाएगा, जो छोटे शहरों और दूरस्थ क्षेत्रों को कनेक्ट करने के लिए उपयोगी होगा। इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास – सरकार ने 2026‑2030 के बीच 50 इलेक्ट्रिक चार्जिंग हब बनाने की योजना बनाई है, जो हवाई अड्डों और प्रमुख हब्स पर स्थापित होंगे। नियम‑नीति समर्थन – सिविल एविएशन मंत्रालय ने इलेक्ट्रिक विमान संचालन के लिए विशेष लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिससे एयरोप्लेन ऑपरेटरों को तेज़ अनुमोदन मिल सके। सहयोगी प्रोजेक्ट – भारत‑जापान संयुक्त इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस रिसर्च सेंटर की स्थापना हो रही है, जहाँ दोनों देशों के वैज्ञानिक बैटरी रेंज और हाइब्रिड‑पावर सिस्टम पर काम करेंगे।

यदि इन कदमों को सही दिशा में लागू किया जाए, तो 2030 तक भारत के घरेलू शॉर्ट‑हॉल फ़्लाइट सेक्टर में 40 % इलेक्ट्रिक पावर की हिस्सेदारी हासिल कर सकता है। यह न केवल कार्बन लक्ष्य को पूरा करेगा, बल्कि यात्रा लागत को भी 15‑20 % तक घटा सकता है।

बैटरी वजन – वर्तमान लिथियम‑सिलिकॉन तकनीक अभी भी भारी है। समाधान के रूप में, शोधकर्ता सोडियम‑आयन और ठोस‑स्थिति बैटरियों पर काम कर रहे हैं, जो वजन घटाने में मदद करेंगे। इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च – चार्जिंग स्टेशन की स्थापना में शुरुआती निवेश अधिक है। सार्वजनिक‑निजी भागीदारी (PPP) मॉडल और ग्रिड‑टू‑हब कनेक्शन से लागत को साझा किया जा सकता है। * रेंज सीमाएँ – अभी के लिए इलेक्ट्रिक विमान की रेंज 800 किमी तक सीमित है। हाइब्रिड सिस्टम और तेज़ चार्जिंग टेक्नोलॉजी के विकास से यह सीमा बढ़ेगी।

इन मुद्दों को हल करने के लिए, सरकार ने “इलेक्ट्रिक एयरोस्पेस इनोवेशन फंड” की घोषणा की है, जिसमें स्टार्ट‑अप्स को अनुदान और टैक्स इंसेंटिव मिलेंगे।

“VayuShakti‑1” की सफल पायलट फ्लाइट ने दिखा दिया कि भारत न सिर्फ टेक्नोलॉजी को अपनाने में बल्कि उसे विकसित करने में भी अग्रसर है। जब हर उड़ान में धुएँ की बजाय स्वच्छ ऊर्जा का झोंका हो, तो वह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी और आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन जाता है। जैसे ही यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ेगा, भारतीय आकाश में हरियाली की नई लहरें उड़ेगी, और दुनिया को यह संदेश देगा कि सतत विकास के लिए भारत तैयार है।

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