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world04 February 2026

Mumbai book event with activist Anand Teltumbde cancelled on police orders, organisers say

Mumbai book event with activist Anand Teltumbde cancelled on police orders, organisers say

एक शाम को मुंबई के एक बड़े कॉफ़ी हाउस में, साहित्य प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भीड़ इकट्ठा हो रही थी, जब अचानक पुलिस ने इवेंट को रोक दिया। आयोजकों का कहना है कि यह कदम सीधे पुलिस के आदेश पर लिया गया, और उन्होंने तुरंत इवेंट को रद्द कर दिया। इस अचानक बदलाव ने न केवल उपस्थित लोगों को चौंका दिया, बल्कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति और सार्वजनिक सभाओं की सीमाओं पर सवाल उठाए हैं।

पृष्ठभूमि और पूर्व घटनाक्रम अनाथ टेल्टुंबड़े, जो दलाई लामा फाउंडेशन और कई मानवाधिकार संगठनों से जुड़े एक प्रमुख विचारक और एक्टिविस्ट हैं, पिछले कुछ महीनों में कई बुक टूर और पैनल डिस्कशन में भाग ले रहे थे। उनका काम अक्सर सामाजिक न्याय, कास्ट सिस्टम और भारत में मौजूदा लोकतांत्रिक चुनौतियों पर केंद्रित रहता है। पिछले साल, टेल्टुंबड़े को कई बार पुलिस द्वारा पूछताछ और निगरानी का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी सार्वजनिक उपस्थिति पर प्रतिबंध लगने की आशंका बनी रही।

मुंबई में आयोजित होने वाली इस बुक इवेंट की योजना कई महीनों पहले बनायी गई थी। आयोजक, एक स्वतंत्र साहित्यिक समूह, ने इस कार्यक्रम को "विचारों की खुली बातचीत" के रूप में प्रमोट किया था। टिकटों की बिक्री तेज़ी से हो रही थी और कई विश्वविद्यालयों और एनजीओ से छात्रों ने इस इवेंट को अपने कैलेंडर में जोड़ लिया था।

क्या हुआ? – घटनाओं का क्रम - शाम 6 बजे के करीब, इवेंट शुरू होने वाला था, लेकिन मंच पर माइक्रोफोन सेट करने के दौरान दो पुलिस अधिकारी आए। - अधिकारियों ने बताया कि उन्हें एक आधिकारिक आदेश मिला है, जिसके तहत इवेंट को रोकना अनिवार्य है। - आयोजकों ने तुरंत सत्र को रद्द कर दिया और उपस्थित लोगों को सूचित किया कि इवेंट अब नहीं हो पाएगा। - कई दर्शकों ने सोशल मीडिया पर इस बात को शेयर किया, और कुछ ने पुलिस के इस कदम को "अधिकारों की दमनकारी कार्रवाई" कहा।

पुलिस ने बाद में एक संक्षिप्त बयान जारी किया, जिसमें बताया गया कि "सुरक्षा कारणों" और "अवांछित सार्वजनिक व्यवधान" को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया। हालांकि, इस बयान में किसी भी विशिष्ट खतरे या सुरक्षा जोखिम का उल्लेख नहीं किया गया।

क्यों है यह महत्वपूर्ण? 1. स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर प्रश्न – भारत में सार्वजनिक मंचों पर विचारों की अभिव्यक्ति हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस इवेंट को रोकना यह संकेत देता है कि कुछ विचारों को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने में अब भी बाधाएँ हो सकती हैं। 2. सामाजिक आंदोलन की गति – टेल्टुंबड़े जैसे सक्रिय कार्यकर्ता अक्सर सामाजिक परिवर्तन के अग्रिम पंक्ति में होते हैं। उनके इवेंट की रद्दीकरण से कई युवा और छात्र समूहों के मनोबल पर असर पड़ सकता है। 3. कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया – इस मामले में स्पष्ट कारणों की कमी ने यह सवाल उठाया है कि क्या पुलिस के पास वैध आदेश है या यह एक अनुचित दखल है। यह मुद्दा न्यायालय में चुनौती का कारण बन सकता है। 4. सांस्कृतिक और शैक्षणिक माहौल – मुंबई को अक्सर "इंडिया का सांस्कृतिक हब" कहा जाता है। ऐसी घटनाएँ इस छवि को धूमिल कर सकती हैं और भविष्य में समान कार्यक्रमों की योजना बनाते समय आयोजकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है।

आगे क्या हो सकता है? – संभावित परिणाम - कानूनी चुनौती – इवेंट के रद्दीकरण के खिलाफ आयोजकों और टेल्टुंबड़े की कानूनी टीम संभवतः हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकती है, जिससे इस तरह के आदेशों की वैधता पर परीक्षण होगा। - पुलिस-समाज संवाद – कई नागरिक समूह इस कदम को लेकर पुलिस के साथ संवाद शुरू कर सकते हैं, जिससे भविष्य में सार्वजनिक सभा की अनुमति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की मांग बढ़ेगी। - वैकल्पिक मंच – डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की बढ़ती पहुँच को देखते हुए, टेल्टुंबड़े और उनके समर्थक ऑनलाइन वेबिनार, लाइव स्ट्रीम या सोशल मीडिया टॉक्स के माध्यम से अपने विचार साझा करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। - सामाजिक आंदोलन में नई ऊर्जा – प्रतिबंध अक्सर विरोध को और तीव्र कर देते हैं। इस घटना के बाद कई युवा समूहों ने "स्वतंत्र मंच" अभियान शुरू किया है, जिसमें वे छोटे-छोटे सार्वजनिक स्थानों पर मुक्त चर्चा का आयोजन करने की योजना बना रहे हैं।

समाज में व्यापक असर यदि इस घटना को एक चेतावनी के रूप में देखा जाए, तो यह भारतीय लोकतंत्र के उन मूलभूत सिद्धांतों को चुनौती देता है, जिन पर हमारी राष्ट्रीय पहचान बनी हुई है। सार्वजनिक स्थानों पर विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति, चाहे वह साहित्यिक हो या राजनीतिक, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है। इस प्रकार की रोकथाम, बिना स्पष्ट कारण के, सामाजिक संवाद को ठंडा कर सकती है और नागरिकों में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकती है।

आगे की राह अंत में, यह स्पष्ट है कि इस इवेंट की रद्दीकरण सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और कानूनी विमर्श का हिस्सा बन गई है। चाहे अदालत में फैसला हो या सार्वजनिक मंचों पर नई नीति, इस मुद्दे पर चर्चा जारी रहेगी, और यह देखना बाकी है कि भारतीय लोकतंत्र इस चुनौती को कैसे संभालता है।

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